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The Longest full lunar Eclipse – 21वीं सदी का सबसे लंबा पूर्ण चंद्रग्रहण आज

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The Longest Full Lunar Eclipse 2018 Of The 21st Century Today

The Longest full lunar Eclipse – आज की रात होने वाला चंद्रगहण 21वीं सदी का सबसे लंबा चंद्रग्रहण माना जा रहा है। इसकी कुल अवधि 6 घंटा 14 मिनट रहेगी। इसमें पूर्णचंद्र ग्रहण की स्थिति 103 मिनट तक रहेगी। भारत में यह लगभग शुक्रवार (आज) रात्रि 11 बजकर 55 मिनट से शुरू हो कर लगभग शनिवार (सुबह) 3 बजकर 54 मिनट पर पूर्ण होगा। इस चन्द्र ग्रहण में सुपर ब्लड ब्लू मून का नजारा भी दिखेगा। चंद्र ग्रहण के समय चांद ज्यादा चमकीला और बड़ा नजर आएगा इसमें पृथ्वी के मध्यक्षेत्र की छाया चंद्रमा पर पड़ेगी। आज के चंद्रग्रहण को देश के सभी हिस्सों से देखा जा सकेगा। भारत के अलावा ये चंद्रग्रहण ऑस्ट्रेलिया,एशियाई देश और रूस में भी दिखेगा।

इस तरह पड़ता है चंद्रग्रहण
सूर्य और चंद्रमा के बीच जब पृथ्वी एक सीधी रेखा में आ जाती है तो यह ज्यामितीय स्थिति चन्द्रग्रहण कहलाती है। अतएव चंद्रग्रहण सिर्फ पूर्णिमा को ही घटित हो सकता है। ग्रहण का प्रकार एवं अवधि सूर्य और धरती के मध्य चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर होता है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है, ग्राह्य, अंगीकार, स्वीकार, धारण या प्राप्त करना। लिहाजा आध्यात्मिक मान्यताएं ग्रहण काल में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को अंगीकार करने के लिए जप, तप, उपासना, साधना, ध्यान और भजन का निर्देश देती हैं। आपको बता दें आज पड़ने वाले इस ग्रहण के बारे में ज्योतिषों ने बताया है कि यह चंद्रग्रहण पृथ्वी की छाया के बीच से चंद्रमा के सीधे गुजरने के कारण इसका समय इतना लंबा होगा। इस दौरान सूर्य से दूरी अधिक होने के कारण पृथ्वी की छाया का आकार बड़ा होगा।

आज समय के साथ इस तरह बदलेगा चांद का आकार

भारत में आज देर रात से चंद्रग्रहण का असर दिखना शुरू होगा। धीरे-धीरे चांद का रंग लाल होता जाएगा और एक समय ऐसा आएगा जब चांद पूरी तरह से गायब हो जाएगा।

शुक्रवार देर रात 10.53 पर चांद पर ग्रहण का असर शुरू होगा, हालांकि नंगी आंखों से कुछ नहीं दिखेगा।

शुक्रवार रात्रि 11.54 पर धीरे-धीरे ग्रहण का असर नंगी आंखों से देख पाएंगे।

देर रात 1.51 पर चंद्रग्रहण अपने सर्वोच्च स्तर पर होगा, ये ही पूर्ण चंद्रग्रहण होगा।

2.43 पर धीरे-धीरे ग्रहण का असर कम होगा।

शनिवार सुबह प्रातः 5.00 बजे चंद्रग्रहण का असर खत्म होगा।

The Longest full lunar Eclipse

आज दोपहर से ही बंद हो जाएंगे कई बड़े मंदिरों के पट

चंद्र ग्रहण 5 ग्रहों बुध, शुक्र, बृहस्पति, शनि और मंगल के साथ बड़ा चक्कर लगाएगा। चंद्रग्रहण के कारण ही देशभर के कई बड़े मंदिर दोपहर बाद ही बंद हो जाएंगे। हरिद्वार, वाराणसी और इलाहाबाद में हर शाम होने वाली गंगा आरती भी दोपहर को होगी। चंद्रग्रहण के कारण ही दोपहर एक बजे गंगा आरती का विशेष आयोजन किया जाएगा। देश के कई बड़े मंदिरों में दोपहर दो बजे के बाद दर्शन नहीं हो पाएंगे।

आकाश में एक रेखा में चमकीले ग्रह, शुक्र, बृहस्पति, शनि, मंगल, एक बड़े घेरे में दिखाई देंगे। सूरज ढलने के ठीक बाद बुध पश्चिम में दिखाई देगा। पश्चिम में शुक्र को देखा जा सकेगा। मध्य आकाश में शनि के बाद बृहस्पति दिखाई देगा। मंगल ग्रह लाल रंग के साथ पूर्वी आकाश में दिखाई देगा।

नासा अंतरिक्ष में भेजा गया ‘अपोलो7’ के लिए 11-22 अक्टूबर को मनाएगा गोल्डन जुबली ईयर

nasa

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खगोल विशेषज्ञों समेत ज्योतिषियों और विज्ञान में रुचि रखने वाले सभी लोगों के लिए यह काफी महत्वपूर्ण है। इससे पहले 16 जुलाई 2000 में सदी का सबसे लंबा पूर्ण चंद्रग्रहण हुआ था, जो कि आज होने वाले पूर्ण चंद्रग्रहण से चार मिनट ज्यादा लंबा था। नासा द्वारा 11-22 अक्टूबर को अंतरिक्ष में भेजा गया ‘अपोलो7’ भी इस वर्ष अपना गोल्डन जुबली ईयर मना रहा है। ऐसे में जानते हैं चांद से जुड़ी कई वैज्ञानिक और महत्वपूर्ण जानकारी जो कि 18 जून 2009 को चंद्रमा पर भेजे गए अमेरिकी सैटेलाइट ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ ने नासा के जरिए साझा की हैं।

पानी की खोज
वैज्ञानिकों का मानना है यदि चांद नहीं होता, तो शायद पृथ्वी पर मानव जाति का उदय भी नहीं हुआ होता क्योंकि समुद्रों में ज्वारभाटा ही नहीं आता। इससे जमीन और समुद्री जल के बीच पोषक तत्वों के आदान-प्रदान की प्रोसेस स्लो हो जाती और मानव जाती होती भी या नहीं ये कहना भी मुश्किल है। ऐसे में चांद पर पानी का मिलना एक बड़ी वैज्ञानिक खोज मानी जाती है। बर्फ के रूप में चट्टानों के बीच चंद्रमा पर ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ ने अक्टूबर साल 2009 में पानी खोजा। यह पानी चंद्रमा के उत्तर पोल पर खोज निकाला गया था। हालांकि यहां पर पानी तरल नहीं बल्कि सॉलिड फॉर्म में मौजूद है। नासा के एलएडीईई प्रोजेक्ट के मुताबिक यह हीलियम, नीयोन और ऑर्गन गैसों से बना हुआ है।

चंद्रमा पर गहरा गड्ढा
चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रमा 4.5 अरब साल पहले पृथ्वी और थीया (मार्स के आकार का तत्व) के बीच हुए भीषण टकराव के बाद बचे हुए अवशेषों के मलबे से बना था। ऐसे में ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ के द्वारा भेजी गई तमाम जानकारियों के बीच 2 बड़े गड्ढों की डिटेल्स बेहद महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये गड्ढे उस वक्त बने जब भूमिगत लावा ट्यूब फटी होगी। ये घटना किसी उल्का पिंड के गिरने से भी संभव है। ये गड्ढे ज्वालामुखी के नजदीक मौजूद क्षेत्र में है।

चंद्रमा न होता तो पृथ्वी पर दिन सिर्फ 6 से 12 घंटे का ही होता

The Longest full lunar Eclipse
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वैज्ञानिकों के अनुसार अगर चंद्रमा नहीं होता तो पृथ्वी पर दिन सिर्फ 6 से 12 घंटे का ही होता। साथ ही एक साल में 365 नहीं, 1000 से 1400 दिन होते। ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ में एक ऐसा यंत्र लगा हुआ है, जो चंद्रमा के तापमान को मापता है। इसको डिविनर कहा जाता है। इस उपकरण ने चंद्रमा के हिस्से का जो तापमान भेजा है, वो सोलर सिस्टम में सबसे ठंडा माना जा रहा है।

इसके अनुसार वहां का तापमान प्लूटो के तापमान (-184 सेल्सियस) से भी कम -248 डिग्री सेल्सियस है। ये स्थान चंद्रमा के दक्षिण पोल पर स्थित है। वहीं चांद की सतह पर बेहद अस्थिर और हल्का वायुमंडल भी मौजूद है। चंद्रमा की सतह पर धूल का गुबार सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पर मंडराता रहता है। इसका असली कारण अभी तक पता नहीं चल सका है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका एक कारण अणुओं का इलेक्ट्रिकली चार्ज होना हो सकता है।

96 प्रतिशत सोलर विजिबिलिटी है चंद्रमा में
चंद्रमा का एक हिस्सा ऐसा हिस्सा है, जिसे वैज्ञानिक डार्क साइड ऑफ मून कहते हैं। दरअसल सूरज की रोशनी के कारण हम चंद्रमा पर मौजूद वास्तविक आकार को समझ नहीं पाते, लेकिन ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ ने अपनी तकनीक से चंद्रमा की एक इमेज साझा की है, जिसमें सबसे ज्यादा पठारी इलाके लाल रंग में नजर आ रहे हैं, वहीं नीले रंग में यह बेहद कम हैं। चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी बेहद कम है। यहां सौर वायु और उल्कापिंड के आने का खतरा लगातार बना रहता है, तापमान में तेज उतार-चढ़ाव के चलते आसमान हमेशा काला दिखाई पड़ता है।

हालांकि चांद के पोल पर मौजूद कई उच्च क्षेत्र ऐसे हैं, जहां लगातार सूरज की रोशनी मौजूद रहती है। 96 प्रतिशत सोलर विजिबिलिटी है चंद्रमा में, इसका मतलब यह हुआ कि वर्ष के 243 दिनों में यहां उजाला रहता है, जबकि अंधेरे का समय 24 घंटे से कभी ज्यादा नहीं होता है।

नासा ने चांद पर 19 एमबीपीएस की स्पीड से वाई-फाई की सुविधा उपलब्ध कराई है

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अगर आप अपने इंटरनेट की स्पीड से खुश नहीं हैं तो आप चांद का रुख कर सकते है। नासा ने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हुए चांद पर वाई-फाई कनेक्शन की सुविधा उपलब्ध कराई है जिसकी 19 एमबीपीएस की स्पीड बेहद हैरतअंगेज है।

चांद पर इंसान का वजन 16.5 प्रतिशत कम होता है  
चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी से कम होती है। अगर आंकड़ों में बात की जाए तो चांद पर इंसान का वजन 16.5% कम होता है। यही कारण है कि चांद पर अंतरिक्ष यात्री ज्यादा उछलकूद कर सकते हैं।

आज तक चांद पर सिर्फ 12 लोग ही पहुंचे हैं
आज तक महज 12 लोग ही चांद पर कदम रख पाए हैं। यूजीन कर्नान आखिरी इंसान थे जिन्होंने मिशन एपोलो-17 के तहत चांद की धरती पर कदम रखा था। उसके बाद से केवल मशीनी रोबोट ही चांद पर पहुंचे हैं।

1950 के दशक के दौरान अमेरिका ने परमाणु हमले की बनाई थी योजना

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वर्ष 1950 के दशक के दौरान अमेरिका ने चंद्रमा पर परमाणु हमले की योजना बनाई थी। शीत युद्ध के दौरान अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए इस टॉप सीक्रेट प्रोजेक्ट को प्रोजेक्ट ए119 का नाम दिया गया था। हालांकि ये प्रोजेक्ट कभी हकीकत में बदल नहीं पाया। दरअसल ये पूर्णत: सोवियत संघ को चेतावनी देने के लिए था जिसने अपना पहला उपग्रह स्पुत्निक-1 लांच कर अमेरिका को अपनी तकनीकी दक्षता का परिचय दे दिया था। इसके तहत अपोलो 11 को चांद पर भेजा गया। ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ ने उस क्षेत्र की भी तस्वीरें नासा को भेजी, हैं, जहां अपोलो 11 लैंड हुआ था। भेजी गई तस्वीरों में 12 फीट परिधि साफ दिखाई दे रही है। इसके अलावा अंतरिक्ष यात्रियों का ट्रैक और वहां छोड़े गए उपकरण भी तस्वीरों में दिखाई दे रहे हैं।

सैर मंडल में चंद्रमा से बड़े उपग्रह भी मौजूद हैं
सौर मंडल में चंद्रमा पांचवे नंबर का बड़ा उपग्रह है। इसके अलावा सबसे बड़ा उपग्रह बृहस्पति ग्रह के पास स्थित है, जो कि असल में प्लूटो और बुध ग्रह से भी बड़ा है। इसके अलावा टाइटन, कैलीस्टो और ईओ भी चंद्रमा से बड़े हैं।

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